School Dropout who built Quick Heal एक प्रेरणादायक कहानी

 School Dropout who built Quick Heal एक प्रेरणादायक कहानी

Truly inspiring success story – CEO of Quick Heal Technologies Kailash Katkar

 

 

दोस्तो ! प्रेरक प्रेरणादायक कहानी की सिरीज़ मे आपको ऐसी Motivational stories in hindi बताने जा रहा हूँ जो आपको life में कभी ना हार माने उसके लिए प्रेरित करेगी।

 

School Dropout who built Quick Heal एक प्रेरणादायक कहानी

School Dropout who built Quick Heal एक प्रेरणादायक कहानी



जानिए, कैलाश काटकर की बेहद इंस्पिरेशनल स्टोरी

दोस्तो ! आपने कभी न कभी अपने मोबाइल फोन, PC या laptop मे security के लिए कोई न कोई Antivirus जरूर इन्स्टाल किया होगा, आपने ऐसे ही एक Antivirus Quick Heal का नाम तो जरूर सुना होगा ।

Quick Heal Technologies के सीईओ kailash katar ने बुरे हालातो का सामना करते हुये अपनी कड़ी लग्न ,मेहनत और बुलंद होसले से वो मुकाम हासिल किया, जो कर पाना नामुमकिन था ।

Antivirus समेत अन्य कंप्यूटर सॉल्युशंस देने वाली कंपनी Quick Heal की सफलता साबित करती है कि व्यक्ति एक दिशा में बढ़ता रहे, तो धीरे-धीरे तरक्की करते हुए ऊंचाई तक पहुंच ही जाता है।

कभी कैलकुलेटर सुधारने वाला एक दसवीं पास शख्स आज दुनियाभर के करोड़ों कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स को वाइरस से बचाता है।

पुणे के कैलाश काटकर की कहानी बताती है कि कामयाब होने के लिए सिर्फ एक चीज चाहिए- भविष्य की संभावनाओं को पहचान लेने वाली नजर।

कैलाश काटकर का जन्म 1 नवम्बर 1966 को Maharashtra के लालगुन गाव के एक सामान्य परिवार मे हुआ। उनके पिता पुणे में एक कंपनी में मशीन सेटर का काम करते थे और उनकी मां एक गृहिणी थीं।

उनके पिता घर पर रेडियो और टेप रिकॉर्डर की रेपयरिंग का काम भी किया करते थे 1985 में परिवार के खराब हालातो के कारण 10वी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद काटकर ने आगे की शिक्षा छोड़ दी

कैलाश काटकर ने 1985 मे परिवार की आय बढ़ाने के लिए रेडियो और कैलकुलेटर मरम्मत की दुकान पर नौकरी की, काटकर को दुकान पर सफाई से लेकर चाय तक के काम मात्र 350 रुपये महिना किया करते थे ।

काटकर को उस समय के Technical Gadgets की चीज़ों जैसे – फेक्टेट मशीन को जोड़ना , डेस्कटॉप इलेक्ट्रिक कैलकुलेटर और लेजर पोस्टिंग मशीन की मरम्मत आदि को सीखने मे दिलचस्पी थी।

दुकान पर काम करते हुये काटकर को दुकान की एक दूसरी ब्रांच जो मुंबई मे थी ट्रेनिंग के लिए वहा भेजा गया



5 वर्षो तक काटकर ने कैल्कुलेटर की दुकान पर काम करते हुये अपनी मेहनत,लग्न से रेडियो और कैल्कुलेटर की सभी बारीकिया सीखी ।

काटकर ने 1990 मे अपने बचत किए हुये 15000 रुपयो से अपनी खुद की दुकान खोली शुरुआत मे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन वो टिके रहे।

धीरे धीरे उनका काम बढ्ने लगा कुछ समय बाद उन्हे बैंक के कैल्कुलेटर ठीक करने का एक Contract मिला ,

काटकर 22 साल के थे जब उन्होने पहली बार कम्प्युटर को बैंक मे देखा, वो बैंक मे अक्सर कैल्कुलेटर ठीक करने जाया करते थे।

कैलाश ने उसी वक़्त समझ लिया की ये तकनीक भविष्य को बदल देगी

कैलाश ने इस नयी तकनीक (कम्प्युटर) को समझने के लिए दिन रात मेहनत जारी कर दी । काटकर के पास कोई डिग्री नहीं थी

इसलिए वे दिन में अपनी शॉप पर काम करते और शाम को कंप्यूटर से संबंधित शॉर्ट टर्म कोर्स करते थे।

इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स की जानकारी होने के बाद उनके रिपेयरिंग काम का दायरा बढ़ा और वे उस समय चलने वाले अन्य ऑफिस गैजेट्स भी सुधारने लगे।

और कुछ समय के बाद काटकर कंप्यूटर मेंटनेंस के कॉन्ट्रैक्ट भी लेने लगे।

1993 मे कैलाश ने अपनी रिपेयरिंग शॉप को CAT Computer Services में बदल दिया।
कहते है ना की कोई भी काम शुरू करते है तो दिक्कते जरूर आती है वैसा ही कैलाश के साथ भी हुआ उन्हे भी काफी प्रोब्लेमस को फ़ेस करना पड़ा लेकिन वो अपने काम मे बिना रुके लगे रहे और उन्होने पहली साल 1 लाख की आय हुई ।

उनके काम का दायरा बढ्ने लगा लेकिन प्रॉब्लेम्स भी आने लगी , उन दिनों इंटरनेट का प्रचलन नहीं था। ज्यादातर वाइरस फ्लॉपी के जरिए फैलते थे और कंप्यूटर का भट्ठा बिठा देते थे। तब कंप्यूटर को फॉर्मेट या रीइंस्टाल कर देने के अलावा कोई चारा नहीं होता था।

इस बीच कैलाश के छोटे भाई संजय ने बारहवीं कक्षा पास कर ली थी। कैलाश तब तक कंप्यूटर्स के महत्व को अच्छी तरह पहचान चुके थे। इन संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने छोटे भाई संजय को कंप्यूटर साइंस में बीएससी करने के लिए प्रेरित किया।

संजय कॉलेज की पढ़ाई करने के साथ भाई के काम में हाथ भी बंटाते थे। वे डि-बगिंग पढ़ रहे थे। काम के दौरान संजय देखते कि बहुत सारे ऑफिस गैजेट्स के खराब होने का कारण वाइरस इन्फेक्शन होता था।

संजय उन्हें सुधारते और कोई नया वाइरस मिलता, तो उसके लिए भी सॉल्युशन खोजते।
कंप्यूटर साइंस में बीएससी के दौरान संजय ने अपने बड़े भाई की सलाह पर प्रोजेक्ट वर्क के लिए वाइरस सॉल्युशन को चुना।

दोनों ने मिलकर एक एंटीवाइरस सॉल्युशन बनाया। जो काफी कारगर साबित हुआ लेकिन इसे कोई खरीदने को तैयार नहीं था।

तब दोनों भाई अपने इस शुरुआती एंटीवाइरस को फ्री में बांटने लगे।

 

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कुछ समय बाद इंटरनेट के चलते कुछ खतरनाक वाइरस आए। इनका सॉल्युशन काटकर बंधुओं के पास ही था। तब Quick Heal का आइडिया आया।

दोनों भाइयों ने मिलकर 1995 में Quick Heal की शुरुआत की। यह सस्ता और कारगर एंटीवाइरस था, इसलिए बहुत पसंद किया गया।

काटकर बंधुओं ने अपने काम को विस्तार देना शुरू किया। उन्होंने कुछ सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स की नियुक्ति की।

1998 में वे रिपेयरिंग का बंद करके पूरी तरह एंटीवाइरस डेवलप करने के काम में आ गए।
लेकिन 1999 में हालात बिगड़ गए।

उन्हें कर्मचारियों की सैलरी जुटाने में भी दिक्कत होने लगी। इस दौरान कैलाश काम बंद करने के बारे में भी सोचने लग गए थे।

लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और दोनों भाई कड़ी मेहनत करते रहे। कुछ महीनों के बाद हालात काफी सुधर चुके थे।

2003 में उन्होंने पुणे से बाहर भी अपने पैर पसारे और नासिक में अपना सेंटर खोला। इसके एक महीने बाद ही उन्होंने आसपास के कई शहरों में सेंटर खोल लिए।

अपनी सफलता के बाद 2007 में कंपनी का नाम आधिकारिक तौर पर Quick Heal Technologies Pvt. Ltd में बदल गया था।

आज Quick Heal Technologies 112+ देशो मे एक ब्रांड के रूप मे Business कर रही है। फिलहाल Quick Heal Technologies की Value 3 ,000 करोड़ रुपए आंकी गई है।

2016 में कंपनी ने शेयर मार्केट में प्रवेश किया और 450 करोड़ रुपए जुटाए।

कंपनी में अब 1,400 से ज्यादा एंप्लाइज हैं और दुनियाभर में इसके 17 मिलियन से अधिक कस्टमर हैं। कंपनी Mobile Solution के क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ रही है।

कैलाश कंपनी के एमडी व सीईओ हैं और संजय चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

अंत मे एक बात हमेशा याद रखिये-

जिंदगी में मुसीबते चाय के कप में जमी मलाई की तरह है,
और कामयाब वो लोग हैं जिन्हेप फूँक मार के मलाई को साइड कर चाय पीना आता है।

दोस्तो आप ये स्टोरी Share जरूर करे और आप अपने सुझाव या विचार नीचे कमेंट बोक्स मे दे सकते है ।



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